भिखारी

वह ठहरा एक मूक भिखारी
पर मुस्कुरा के जा रहा था
पैरों ने दे दिया था जवाब
टेक लाठी चले जा रहा था

दो पल ही ठहरा उस दरवाजे पर
ढोलकी बजा फरियाद सुना रहा था
आवाज दीवारों से टकरा वापस आ गयी
मुस्कुरा के चला जा रहा था

कुछ दरवाजे खुले भी थे
लोग बाहर निकले भी थे
फैलाई झोली मै मिले तिरस्कार को समेट
मुस्कुरा के चला जा रहा था

उस घर का दरवाजा भी खुला
जहां आज ना जलेगा चूल्हा
बाहर निकल उसने गले लगा लिया
बोला क्या डाल पाऊंगा झोली में इस घर से
झोली तो भर चुकी थी उस आलिंगन से

वह ठहरा एक मूक भिखारी
पर मुस्कुरा के जा रहा था
पैरों ने दे दिया था जवाब
टेक लाठी चले जा रहा था

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