गुल दस्ते का वो गुलाब

गुल दस्ते के उस गुलाब को सबने देखा
वो भी मूक, महफिल को देख रहा था
किसीने ना छुआ, किसी ने ना सराहा
तन्हा बेचारा उदास, रंगीन महफिल को सह रहा था
कोमल पंखुड़ियों को सहला के, जेब मे सजाया
कुछ उसका भी दिल बहलाया
देखा गौर से तो , उदास वो, अब खुशी से हंस रहा था
हंस रहा था
हंस रहा था
गुल दस्ते का वो गुलाब जिसे सबने देखा
सबने देखा

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