मैं सुनसान वीरानी सड़क

चहल पहल रहती है दिन में,
पर रात भी होती है ,
तब कोई नहीं आता.
किस्से कहानियाँ,
या फिर कोई दुख दर्द, या गीत
कोई कुछ नहीं सुनाता
रात के आगोश में,
मैं सुनसान वीरानी सड़क
एक साथी को तरसती हूँ

बस सोचती हूँ,
कि भूला भटका…
कोई तो इस राह आये,
मेरी चाह और पनाह पाए,
पर, कोई नहीं है आता
कोई नहीं है जाता
रात के इस वीराने में,
मै अकेली
दो बातें करने को तरसती
रात के आगोश में,
मैं सुनसान वीरानी सड़क
एक साथी को तरसती हूँ

दिन तो बिल्कुल ही अलग होगा
कई लोग मिलेंगे, गुज़रेंगे यहां से
कई खुशनुमा बातें होंगी …
पर, रात के आगोश में,
मैं सुनसान वीरानी सड़क
एक साथी को तरसती हूँ

लंबी रात की चादर ओढ़,
एक उम्मीद से सोती हूँ
कि कल सिरहाने फिर…
कदमों की आहट होगी,
किस्सों की फुसफुसाहट होगी,
गीतों की गुनगुनाहट होगी
और मेरे ज़ेहन में
प्यार की गर्माहट होगी

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