दीदार

दोपहर की धूप थी
छत पे जा,
दीवार के कोने तक पहुंचने के लिए
पैरों के तलवों को जला डाला

दर्द वो इश्क़ का था
समय उसके घर लौटने का था
जलन मीठी सी लग रही थी
उसके दीदार की खुशी जो महक रही थी

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