शराफत के बाज़ार, अब नहीं लगते
जो बचे हैं उनमे सिर्फ फरेब बिकता है
पहली सी सादगी अब नहीं दिखती
नाउम्मीद इंसान सहमा सा दिखता है
English And Hindi Poetry
शराफत के बाज़ार, अब नहीं लगते
जो बचे हैं उनमे सिर्फ फरेब बिकता है
पहली सी सादगी अब नहीं दिखती
नाउम्मीद इंसान सहमा सा दिखता है