
ये जो मन भटका हुआ है,
दोराहे पे जा खड़ा है
रस्ता नहीं माकूल,
मंज़िल नहीं मालूम….
चलते हुए इन राहों पर,
कई मुस्कान आए,
कई मंज़र बिखेरे..
कुछ अच्छे थे,
मनमोहक थे,
उन्हें देख ठिठका.
और कुछ ने कहा,
आगे चलो.
मुकाम दर मुकाम,
शहर दर शहर..
अक्सर ख़ुद से बेखबर
तलाशता ही रहा ..
कोई चेहरा जो दे पुरसुकूं
आज भी एक शहर में ठहरा हुआ हूँ,
कुछ थमा सा, कुछ उलझा हुआ हूँ,
न जाने क्यूँ ये लगता है कि,
चौराहे पर…आराम से कुछ पल ठहर
नक्शा नहीं देखा,
और शायद गलत राह पकड़ ली
पर दुबारा नक्शे पर जो नज़र डाली,
इसी शहर में इक राह नज़र आई,
आस की लौ दपदपाई,
कि वाह, इसी शहर में इक रस्ता है,
जो उस शहर तक जाता है,
जिसे मैं बस्ती, बस्ती, वक़्त, बे वक़्त ढूंढा करता हूं…
बस आने वाले चौराहे पर,
सतर्क रहना होगा,
नज़र साफ रखनी होगी..
ताकि फिर कोई और राह न भटकूं