
वो आखिरी शाम
जो मयखाने के दरवाज़े से गुज़री
याद दिलाएगी एक गुज़रे वक़्त की
कोई फूल फेंकता तो पकड़ लेता
यहां कुछ तीखी फुसफुसाहटेंऔर आवाजें थी
उनको गौर से सुनता था
जरा माहौल का इल्म तो हो
जिन सड़को पे उतरा हूँ
उनके राहगीरों से वाकिफ तो हूँ
कहता था मैं खुद से
वाक़फ़ीयत कुछ बढ़ के हो चली
बहुत देर तू भटक लिया इस गली
अपनी मंज़िल के जानिब
बढ़ने को अब देर हो चली
आज निकल आया हूँ
अलविदा कह कर
मिलके मयखाने से गले
गुजरे पलों का आभार कह कर
ये तो बहुत देर मैं, ठहर गया
वर्ना जाना वहां तक है
जहां मेरी मंजिल मुझे ले चले