समंदर के गुरूर को भी देखा है
कोमल प्रेम भरे रेतों के घरों से बस खेल पाता है
हर गुरूर का दायरा सीमित होता है
अपने दायरे के बाहर, अट्टहास खड़े बुलंद महलों को सिर्फ़ तकते रहता है
English And Hindi Poetry
समंदर के गुरूर को भी देखा है
कोमल प्रेम भरे रेतों के घरों से बस खेल पाता है
हर गुरूर का दायरा सीमित होता है
अपने दायरे के बाहर, अट्टहास खड़े बुलंद महलों को सिर्फ़ तकते रहता है