
राहतें और भी हों वस्ल की राहत के सिवा
गर आज कुछ भी और जो बन गया हो मुतब्दिल
तो वो मुहब्बत न थी
गुम हुए जो ये चिराग जला कर
किसी और मंज़िल की जानिब उन चिरागों की लौ में
जलाने वाले की शिद्दत न थी
यूँही न कर इस तरह तू इस दस्तबरदरी का बयान
न मिट सकेंगे उस पहली मोहब्बत के निशां
महबूब की उस आवाज़ को तू फिर बनाले साज
जा देख वहां आज भी जल रहा है चिराग
राहतें और भी हों वस्ल की राहत के सिवा
गर आज कुछ भी और जो बन गया हो मुतब्दिल
तो वो मुहब्बत न थी