
जिस्म से लहरें टकरा रही थी
हौले हौले भीगा रही थी
ढलते सूरज की शिथिलता दिल को लुभा रही थी
रात के आगोश की लालिमा छा रही थी
कुछ पलों का नज़ारा, जहां मे ताउम्र के लिए बसने वाला था
सच्चे माहौल के झूठे बोल, कानों में गूंजने लगे थे
सूर्य अस्त हो रहा था
अरमानों को हवा देकर