गुरूर

समंदर के गुरूर को भी देखा है
कोमल प्रेम भरे रेतों के घरों से बस खेल पाता है
हर गुरूर का दायरा सीमित होता है
अपने दायरे के बाहर, अट्टहास खड़े बुलंद महलों को सिर्फ़ तकते रहता है

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