हमारा प्यार

तू नज़रें झुका के क्यों चलती है सामने मेरे
नज़रें दिखें तो न मैं कुछ पढूं
नज़रें गर बयान करे किताबों के पन्ने
नज़रों के रुबरू होने पर ही तो उन्हे गिन सकूं

एक करके पन्ने पलटो तुम, हर नज़र पे हैं निगाहें मेरी
झुकी पलकों के पन्ने, तिरछी नज़रों के पन्ने
बंद आँखों के पन्ने, या आसमां को तकते पन्ने
आंखे चार हो तो उस पन्ने को सहेजूं

नर्म आँखो से भीगे पन्ने जो पलट भी न पाऊं,
सुराग तलाशने में ता उम्र लग जाए उन दो मोतियों के
कुछ न कह पाने वाले मूक पन्नों को सुलगाऊं
की कोई हलकी सी आवाज भर तो नसीब पाऊं

किताबे दिल की यूं अब नज़रों से बयां मत करो
है किसका इंतज़ार खोल डालो अब ये बंद द्वार
सुन ने को बेताब हूँ दो बोल तुम्हारे,वो दो शब्द
कह जाओ तुम भी, आज सुन ले हम भी, हमारा प्यार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *