
गोरी रे बता जरा
चंचलता से तू क्यूँ है चलती,
आँखों में सागर लिए क्यूँ हँसती,
श्रृंगार तुझ पर इतना क्यूँ सजता,
बिन देखे ये मन क्यूँ मचलता
गोरी रे बता जरा
हवा में तेरी महक क्यूँ उमड़ती
जहां से भी तू गुज़रती
एहसास तेरे होने का इतना गहरा क्यूँ होता
मन की आंखों से जब मैं देख रहा होता
गोरी रे बता जरा
बादलों में भी तेरी परछाइ क्यूँ दिखती
कानों में तेरी हंसी क्यूँ है गूंजती
सपनों में आकर क्यूँ जगाए रखती
पल, पल दिल में क्यूँ तू है बसती,
गोरी रे बता जरा