सुबह की पहली किरण सी जिन्दगी

सुबह की पहली किरण सी जिन्दगी
जो होने वाले उजाले की तरह गहरी होगी
भोर की लालिमा में उठा पंछी कलरव
सुकून बरसाएगा, वो जिन्दगी होगी

फिर दोपहर की धूप भी होगी
चलते पांव कुछ झुलसेगे दर्द में
चलना लाजिमी होगा
वरना शीतल शाम न होगी

ये दो पहर, कभी तीन ना होगी
ये वक्त चलता है मघम
पर इसके बाद शीतल चांदनी होगी
दोपहर में गर झुलसे पांव न थमें
तो शाम के आगोश में पहुंच
जीत सिर्फ तेरी होगी i

जब भी कदम लड़खड़ाने को आए,
हवा भी अगर बेरुखी हो जाए,
मन भी कुछ अन्मना हो जाए
तब दिल में सदा एक लौ को जलाए

समय की आँधियों से उसको बचाए
हवा के थपेड़ों से उसको छुपाए
वो मन जो झुके न झुकाए
और बढ़ते चले जाए

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