
आंखें तक रही है कब से
सूनी सूखी मिट्टी की पुकार
आ जाओ इंतज़ार है कब से
बादलों की मगर धीमी है रफ्तार
(2)
झुलसे बदन धूप की तपिश
वो किसी का घर बना रहा है
ए बादल मुझसे क्यूँ है रंजिश
लम्हा भर भिगो दे मुझे, कह रहा है
(3)
बादलों का ये इंतज़ार मुझे भी है
यहां बिजली रहती है गुल
ए सी कूलर सब यंत्र हैं बेकार
चाहत है बरसे एक मस्त फुहार
(4)
सब का प्यारा बादल है सच
इस बार भी अपनी राह चलेगा
कन्या कुमारी से कश्मीर तक
हर रूह को एक बार तो तृप्त करेगा